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बुन्देलखण्ड मे 1857-58 की क्रांति ।

बुन्देलखण्ड में 1857 की क्रांति मे आज का दिन।  1 जून 1857।  झांसी मे कैप्टन गाॅरडन ने कैप्टन स्कीने को सूचित किया कि गुप्तचरों से सूचना मिली है कि करेरा के ठाकुरों ने 2जून को विद्रोह करने का निश्चय किया है। अतः झांसी से लेफ्टिनेंट रीव्स को एक सेना की टुकड़ी के साथ करैरा के किले पर अधिकार करने के लिए भेजा गया।  आज ही ग्वालियर में महाराजा सिंधिया की सेना में विद्रोह के लक्षण दिखाई दिए। सेना का एक अधिकारी 6 सिपाहियों के साथ दिल्ली भाग गया।  1 जून, 1858 - ग्वालियर में बडागांव के मोर्चे पर कालपी की क्रान्तिकारी सेना और सिंधिया की सेना के मध्य युद्ध शुरू हुआ। सिंधिया की सेना की मोरचेबंदी इस प्रकार थी। मध्य में केशव राव लागोर, बाऐ भाग में बापू अवार तथा जयाजीराव सिंधिया खुद सबसे पीछे थे। पहली झपट में क्रान्तिकारी कमजोर पडे और पीछे हटने लगे। तभी लक्षमी बाई ने रणक्षेत्र में आगे आकर सैनिकों को ललकारा और जोश भरा। क्रान्तिकारी सैनिक दीन दीन का नारा लगा कर सिंधिया की सेना पर झपटे। अचानक ही दीन दीन का नारा सिंधिया की फौज से भी उठा। और उसके सैनिक क्रान्तिकारियों की तरफ हो गए। सिंधिय...
१८५७की क्रांति और डाक्टर्स-2 पिछली एक पोस्ट में मैंने कहा था की १८५७-५८ की क्रांति में डाक्टरों की क्या भूमिका थी उसके बारे में मै कुछ लिखूंगा | इसका कारण भी मैंने बतला दिया था की चूँकि मै इसी विभाग से सेवा निवर्त हुआ और अभी भी इसी की पेंशन से अपना जीवन चल रहा है तो स्वाभाविक रूप से मेरी रूचि थी कि इस स्वाधीनता संग्राम में डाक्टरों की कुछ भूमिका भी थी कि नही अगर इस बारे में कुछ पता चले तो उसके बारे में लिखूं | चाहे वे अपनी तरफ के हों या अंग्रेजों के तरफ के | इसी क्रम में मैंने जालौन के डाक्टर हेमिंग के बारे लिखा था की किस प्रकार उनका बध क्रांतकारियों द्वारा किया गया था | आज जब ज्यादा कुछ करने को नही था तो १८५७-५८ की क्रांति में डाक्टर्स की दूसरी कड़ी में मै एक अन्य डाक्टर साहब के बारे में लिख रहा हूँ | इन डाक्टर साहब का नाम है डाक्टर सालेह मोहम्मद | जब मै झाँसी में सहायक निदेशक मलेरिया के कार्यालय में सीनियर लेबोरेट्री टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत था तब एक दिन अइसे ही दिमाग में विचार आया कि झाँसी में भी किसी डाक्टर ने क्रांति भाग लिया था की नही इस बारे में कुछ पता किया जाय | अब यह न पूछि...

बैसों के लिए अभी रारी दूर थी।

असलम खां की पराजय के बाद अर्गल के राजा की पत्नी ने बक्सर (जिला - उन्नाव) में गंगा तट पर स्थित शिव की पूजा-अर्चना और गंगा स्नान के लिए प्रस्थान किया। इस यात्रा मे रानी के साथ उनकी अविवाहित पुत्री और बहुत कम ही सेवक व सैनिक थे। इस यात्रा की भनक शायद अर्गल नरेश को भी लगने दी गई थी। आश्चर्य होता है कि यात्रा की बात राजा से क्यों छिपाई गई। यह मेरा केवल अनुमान ही है शायद असलम खां के साथ हुए युद्ध मे रानी ने मनौती मानी हो कि यदि राजा कुशलतापूर्वक रहते हुए विजयी होंगे तो (रानी) गंगा स्नान कर शंकर भगवान के दर्शन करके उनको गंगाजल से स्नान कराएंगी। राजपूत स्त्रियों मे पतिभक्ति और देश भक्ति के उच्च आदर्श हमेशा से रहे हैं। खैर कारण कुछ भी रहा हो जिस दिन बक्सर मे मेला लगता है अर्गल राज की रानी भी पहुंची। यह पहले ही कहा जा चुका है कि असलम खां पराजय के बाद भी अवध के सूबेदार के पास वापस नही लौटा था। वह भी बक्सर के पास ही रुक कर फिर से युद्ध की तैयारियों मे लगा था। असलम खां को अर्गल की रानी के बक्सर आगमन की सूचना उसके आदमियों ने दी। उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि रानी को कैद करके उनको मेरे टेंट मे लाए...

रारी के बैस क्षत्रिय

इस क्षेत्र मे बैसों का आगमन तो काफी पहले हो गया था वे न तो किसी महत्वपूर्ण पदों पर ही थे और न ही भूमि स्वामी ही थे। इस भाग मे गौतम क्षत्रिय ही प्रमुख थे। कन्नौज के राजा से भी उनके अच्छे संबंध थे जिनके अधीन यह भाग था। गौतम क्षत्रियों की स्टेट इस भाग मे थी और अर्गल नामक स्थान पर किला और जागीर का मुख्यालय था। 1250एडी मे अर्गल के राजा ने दिल्ली सल्तनत को ट्रिब्यूट भेजना बंद कर दिया।जब कई बार कहने के बाद भी सालाना राजस्व दिल्ली नही भेजा गया तब युद्ध तो होना ही था। दिल्ली से अवध के सूबेदार खो खबर भेजी गई कि अर्गल के राजा से कर वसूला जाय। अवध का सूबेदार असलम खां फौज फटाके के साथ अर्गल मे आ धमका। अर्गल वाले पहले से ही तैयार थे अतः सूबेदार को मुहकी खानी पड़ी और लौटना पड़ा। मगर वह उन्नाव जिले मे गंगा पार बक्सर के पास ही रुक गया और अवसर का इंतजार करता रहा। उसको अवसर भी जल्द ही मिल गया। कारण अर्गल की रानी की एक छोटी सी गलती से। गलती क्या थी वह अगली किस्त मे। 

मेरा गांव रारी

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मेरा गांव रारी, थाना किशनपुर, तहसील खागा उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर मे स्थित है। रारी गांव कब बसा किसने बसाया इसके बारे मे तो कुछ पता नही चलता है। पहली बार मुझे इसका उल्लेख आइने अकबरी मे मिला जिससे पता चला कि उसके समय से पूर्व रारी एक परगना था और उसका मुख्यालय भी। लेकिन यहां के लोग इतने उदंड थे कि मुख्यालय को रारी से हटा कर एक मील दूर इकडला गांव मे शिपट कर दिया गया। मेरे वंशज यहां पर कब बसे इसका भी कोई रिकार्ड उपलब्ध नही है। पर पंद्रह पीढियों की वंशावली से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हज़ारों सालों से यहां जरूर रह रहे होंगे। मेरा परिवार त्रिलोक चंदी बैस है। अगली पोस्ट में देखेंगे कि बैसो का इतिहास क्या है।