१८५७की क्रांति और डाक्टर्स-2
पिछली एक पोस्ट में मैंने कहा था की १८५७-५८ की क्रांति में डाक्टरों की क्या भूमिका थी उसके बारे में मै कुछ लिखूंगा | इसका कारण भी मैंने बतला दिया था की चूँकि मै इसी विभाग से सेवा निवर्त हुआ और अभी भी इसी की पेंशन से अपना जीवन चल रहा है तो स्वाभाविक रूप से मेरी रूचि थी कि इस स्वाधीनता संग्राम में डाक्टरों की कुछ भूमिका भी थी कि नही अगर इस बारे में कुछ पता चले तो उसके बारे में लिखूं | चाहे वे अपनी तरफ के हों या अंग्रेजों के तरफ के |
इसी क्रम में मैंने जालौन के डाक्टर हेमिंग के बारे लिखा था की किस प्रकार उनका बध क्रांतकारियों द्वारा किया गया था | आज जब ज्यादा कुछ करने को नही था तो १८५७-५८ की क्रांति में डाक्टर्स की दूसरी कड़ी में मै एक अन्य डाक्टर साहब के बारे में लिख रहा हूँ | इन डाक्टर साहब का नाम है डाक्टर सालेह मोहम्मद |
जब मै झाँसी में सहायक निदेशक मलेरिया के कार्यालय में सीनियर लेबोरेट्री टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत था तब एक दिन अइसे ही दिमाग में विचार आया कि झाँसी में भी किसी डाक्टर ने क्रांति भाग लिया था की नही इस बारे में कुछ पता किया जाय | अब यह न पूछिएगा की आखिर यह विचार आया ही क्यों क्योंकि मै पहले ही कह चूका हूँ की १८५७ की क्रांति मेरा प्रिय विषय रहा है | तो साहब खोज शुरू हुई |
किताबें और डाकुमेंट्स का अध्ययन शुरू करने पर पता चला की उस समय झाँसी में कई नेटिव डाक्टर कार्यरत थे | रेजिमेंट में डाक्टर शेख रहीम बक्स ,जेल में मिर्जा वाकर बेग और शहर की सरकारी डिस्पेंशरी में डाक्टर सलेह मोह्हमद | कहीं कहीं इनके नाम के आगे मोह्हमद पहले लगा कर मोह्हमद सलेह भी लिखा मिला | ख़ैर कुछ भी कहिए झाँसी के लोग उनको हकीम साहब ही कहते थे | झाँसी में क्रांति शुरू होते ही डाक्टर रहीम बक्स और डाक्टर मिर्जा बाकर बेग तो बवाल देख झाँसी से निकल लिए मगर डाक्टर सलेह मोह्हमद झाँसी में रुके रहे | अब जो कुछ भी पता करना था वह डाक्टर सलेह मोह्हमद के बारे में करना था | मेरी इस पोस्ट के हीरो यही डाक्टर सलेह मोह्हमद ही हैं |
क्रांति में डाक्टर साहब के रोल के बारे में जो पहली सुचना मिलती है वह अंग्रेजों के झाँसी पर अधिकार करने के बाद जो लोगों ने बयान दिए उससे पता चलती है | मेजर स्किने के खानसामा शहाबुद्दीन ,सिपाही अमान खां तथा डिप्टी कलेक्टर थोर्टन ने अपने बयानों में डाक्टर सलेह मोह्हमद का नाम लिया | शहाबुद्दीन ने अपने बयान में विस्तार से घटना का व्योरा देते हुए कहा की ८जुन,१८५७ को किले में शरण लिए हुए अंग्रेजों का राशन तथा गोला बारूद करीब करीब खत्म हो गया था | साथ ही सुबह ही किसी क्रन्तिकारी की गोली से (एक जगह तीर का उल्लेख है ) कैप्टेन गार्डनमारे गए | इसके बाद अंग्रेजों की हिम्मत जवाब दे गई | कैप्टेन स्किने ने किले के परकोटे से सफ़ेद कपड़ा फहरा कर संधि का संकेत किया | परकोटे के नीचे की दीवाल के पास क्रन्तिकारी सैनिक स्किने से बात करने को आ गये | स्किने ने कहा कि हम इस शर्त पर आत्मसमर्पण को तैयार हैं की हमको बिना किसी बाधा के सागर जाने दिया जाय | सैनिक इसके लिए तैयार थे मगर उनकी शर्त थी कि अंग्रेजों को अपने सभी हथियार किले में छोड़ कर नीचे आना पड़ेगा | स्किने इसके लिए तैयार नही था | उसने कहा की आप लोगों ने हमारे कई साथियों की हत्या कर दी है अतः हथियार नही देंगे | बात यहीं फस गई मगर अंग्रेंजों के पास ज्यादा विकल्प नही थे | अतः उन्होंने कहा की कोई ऐसा आदमी हमारे जीवन की गारंटी ले जिसको हम जानते हों और उसका फ़ौज से कोई संबंध न हो |
अब क्रन्तिकारी सैनिक डाक्टर सलेह मोह्हमद को किले के परकोटे के नीचे लाए और उन्होंने स्किने को वचन देते हुए कहा की आप लोग हथियार किले में छोड़ कर नीचे आ जाएँ आप का कोई रोयाँ भी नही छुएगा | स्किने ने सोचा होगा कि डाक्टर तो हमारा वेतन भोगी है इस पर भरोसा किया जा सकता है| एक बात और बताना चाहूँगा स्किने के पिता भी डाक्टर थे | डाक्टर के लड़के का एक डाक्टर पर विश्वास करना स्वाभाविक है | सब अंग्रेज इस आश्वासन पर किले से नीचे उतर आए और जब सबको छावनी की तरफ ले जाया जा रहा था और यह दल झोकन बाग तक पहुंचा था तभी छावनी की तरफ से एक सवार घोडा दौडाते हुए झोकन बाग पहुंचा और कहा की सूबेदार काले खां का हुक्म है कि सब अंग्रेंजों को मार दिया जाय | यह सुनना था की जेल दरोगा बख्शीश अली ने तलवार से पहला वार स्किने पर कर दिया | फिर क्या था देखते ही देखते सभी अंग्रेंजों को मार दिया गया | अब आगे कि कहानी यह है की इसके बाद बयानों में कहा गया कि मोहम्मद सलेह रानी झाँसी के सलाहकार बन गये क्योंकि इस घटना के बाद सैनिक झाँसी रानीलक्ष्मी को सौंप कर यहाँ से चले गये थे | अंग्रेजों को जब सलेह मोह्हमद के बारे में पता चला तो उन्होंने उन पर जिन्दा या मुर्दा पकड़वाने पर १०००ह्जार रूपये इनाम की घोषणा कर दी | मगर उनको पकड़ा नही जा सका | कमिश्नर पिंकने के पास और भी बहुत से काम थे अतः मामला ठन्डे बस्ते में चला गया | मगर मेरा मन अब यह जानने के लिए व्याकुल कि आखिर डाक्टर सलेह मोहम्मद कहाँ गायब हो गये | पुस्तकों में यहीं तक का विवरण है आगे मौन है | क्या कहीं कुछ मिलने की संभावना है | आखिर में अभिलेखागार का रुख किया | पत्रों और फाइलों का अम्बार कुछ मिलने की संभावना शून्य के बराबर | वहां मदद भी कम | लेकिन मैंने पाया कि मै क्रांतिकारियों को खोजता हूँ तो वे भी मुझसे ही अनाशय ही टकरा जाते हैं | 
१८५७ में जैसे जैसे जिलों में अंग्रेजों का अधिकार होता जाता था वहां जासूसों का जाल फैला दिया जाता था | शाहजहांपुर जिले की एक फ़ाइल् में वहां के एक अंग्रेजों के जासूस का पत्र था जिसमे उसने वहां के कलेक्टर को सूचित किया कि यहाँ पर एक आदमी है जो झाँसी में हुई क्रांति की घटनाओं का अपने मित्र मंडली
में एइसा किस्सागोई के द्वारा वर्णन करता है जैसे वह इन घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शक रहा हो | कलेक्टर साहब ने इस में रूचि ली और जिले की पुलिस से कहा कि इन साहब को मेरे सामने पेश करा जाय | अब पूरी फ़ाइल् तो मुझको देखनी ही थी | अब अगर मै आगे का वर्णन ऐसे करूंगा जैसे रिसर्च स्कालर कतरे है और जैसा मैंने किया भी है तो कहानी में मजा नही आयगा | तो आगे का किस्सा इस तरह है की सलेह मोह्हमद को पकड़ कर शाहजहांपुर के कलेक्टर के सामने पेश किया गया | पूछने पर डाक्टर साहब ने बतलाया कि १८५७ में वे झाँसी में सिविल डिस्पेंसरी में डाक्टर थे | अब अगला सवाल यह था की जब आप यहाँ आ गये थे तो फिर आपने यहाँ अपने को रिपोर्ट क्यों नही किया | इस प्रकार के आदेश थे कि जो सरकारी कर्मचारी जान बचाने के लिए जहाँ भी गया हो वही रिपोर्ट करे | इसका डाक्टर साहेब के पास कोई जवाब नही था | उस समय तो डाक्टर साहब को घर जाने दिया गया मगर कलेक्टर साहब ने झाँसी के कमिश्नर को एक पत्र लिख कर डाक्टर सलेह के बारे में सूचित कर दिया | पिंकने को तो घर बैठे शिकार हाथ आ गया | फौरन झाँसी से पत्र गया कि डाक्टर को फौरन गिरफ्तार करके झाँसी भेजे वह वांटेड है और उस पर एक हजार रूपये का इनाम घोषित है | लिहाजा डाक्टर साहब कैद कर लिए गए | अगले पत्र में उनको झाँसी कैसे भेजा जाय उसका विवरण है | हैवी एस्कोर्ट के साथ उसको जालौन लाने और यहाँ उसको जालौन के डिप्टी कमिश्नर टरनन को सौपने को कहा गया | टरनन को आदेश थे कि फिर वे उसको झाँसी भेंजे | शाहजहांपुर से डाक्टर साहब के साले शर्फुदीन साहब भी उनकी मदद और पैरवी के लिए साथ साथ झाँसी आए |
क्या होना था झाँसी में | उन पर मुकदमा चलाने का नाटक हुआ | जो चार्ज लगा रहे थे वही जज भी थे | पिंकने को स्पेशल कमिश्नर की पावर भी मिली हुई थी | उन्होंने डाक्टर सलेह मोह्हमद को फांसी की सजा सुनाने में जरा भी देर नही की | डेथ वारेंट ईशु करके झाँसी के डिप्टी कमिश्नर मैक्लीन से कहा गया की फांसी पर लटका कर सूचित करें | ४अक्तुबर,१८५८ को डाक्टर सलेह मोह्हमद को झाँसी पर लटका कर फांसी की सजा दी गई | फांसी का ओरिजनल वारेंट मेरे पास है अलग से पोस्ट करुगा |
मेरे इस लेख के साथ एक मजेदार घटना को सुना कर बंद करता हूँ| हुआ यह कि डाक्टर सलेह पर मेरा लेख दैनिक जागरण झाँसी में ११दिसम्बर,२००० में प्रकाशित हुआ | झाँसी अस्पताल के शायद १२५ वर्ष पुरे होने पर एक आयोजन होना था | मेरा लेख प्रकाशित हो चूका था परन्तु मै अपने पुरे नाम देवेन्द्र कुमार सिंह के नाम से ही लिखता था | आफिस में मै डी.के.सिंह के नाम से ही जाना जाता था | देवेन्द्र कुमार सिंह को बहुत खोजा गया मगर नही मिले और कार्यक्रम हो गया | डाक्टर सलेह को भी याद किया गया |रिटायर होने के बाद मैंने झाँसी के क्रांतिकारियों के बारे फिर लिखना शुरू किया तब हमारे विभाग के ही सर्जन डाक्टर रामनारायण शर्मा जो खुद भी रिटायर हो चुके थे और इतिहासकार साहित्यकार के साथ साथ उच्च कोटि के लेखक भी हैं ने जागरण से पता लगा कर मेरा फोन नम्बर लिया और मिलने का समय लेकर पति पत्नी घर आये उनको अभी भी नही मालुम था कि डी.के.सिंह उन्ही के अधीन कार्यरत देवेन्द्र कुमार सिंह हूँ | सामने आने पर भेद खुला | तब उन्होंने बतलाया कि वे तो देवेन्द्र कुमार सिंह को ही खोजते रहे | तब से वे मेरे प्रेरणा के स्रोत्र है | उनकी क्रपा मेरे ऊपर हमेशा रहती है |  
डाक्टर सलेह की कब्र झाँसी में कहाँ है कोई बतलाने वाला नही है | पता नही लोग इस पोस्ट को पढ़ेगे कि नही या लाइक करके आगे चल देंगे | मगर मै तो अपने विभाग के क्रांतिकारियों को कैसे भूल सकता हूँ | इस लिए कही ये कहानी

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