बैसों के लिए अभी रारी दूर थी।
असलम खां की पराजय के बाद अर्गल के राजा की पत्नी ने बक्सर (जिला - उन्नाव) में गंगा तट पर स्थित शिव की पूजा-अर्चना और गंगा स्नान के लिए प्रस्थान किया। इस यात्रा मे रानी के साथ उनकी अविवाहित पुत्री और बहुत कम ही सेवक व सैनिक थे। इस यात्रा की भनक शायद अर्गल नरेश को भी लगने दी गई थी। आश्चर्य होता है कि यात्रा की बात राजा से क्यों छिपाई गई। यह मेरा केवल अनुमान ही है शायद असलम खां के साथ हुए युद्ध मे रानी ने मनौती मानी हो कि यदि राजा कुशलतापूर्वक रहते हुए विजयी होंगे तो (रानी) गंगा स्नान कर शंकर भगवान के दर्शन करके उनको गंगाजल से स्नान कराएंगी। राजपूत स्त्रियों मे पतिभक्ति और देश भक्ति के उच्च आदर्श हमेशा से रहे हैं। खैर कारण कुछ भी रहा हो जिस दिन बक्सर मे मेला लगता है अर्गल राज की रानी भी पहुंची।
यह पहले ही कहा जा चुका है कि असलम खां पराजय के बाद भी अवध के सूबेदार के पास वापस नही लौटा था। वह भी बक्सर के पास ही रुक कर फिर से युद्ध की तैयारियों मे लगा था।
असलम खां को अर्गल की रानी के बक्सर आगमन की सूचना उसके आदमियों ने दी। उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि रानी को कैद करके उनको मेरे टेंट मे लाएं। वही हुआ जैसे ही रानी और उनकी पुत्री गंगा स्नान करके डोलियों मे बैठ कर मंदिर के लिए चलीं असलम खां के सैनिकों ने अर्गल के अनुचरों पर हल्ला बोल दिया। अर्गल राज के सैनिकों की संख्या बहुत कम थी। फिर भी वे बहादुरी से लडे लेकिन ज्यादा देर तक मुकाबला नही कर सके। कुछ मारे गए, कुछ गंभीर रूप से घायल होकर तितर-बितर हो गए। डोलियों पर असलम खां के सैनिकों का अधिकार हो गया। रानी विकट स्थिति मे फंस गई थी। अतः उसने गोहार लगाई कि क्या यहाँ पर कोई नही है जो हमारी रक्षा कर सके।
पास मे ही दो नव युवक भी गंगा स्नान कर रहे थे। दोनों धुर दक्षिण से नर्मदा नदी के पास स्थित "मूंगी पाटन" से भ्रमण करते हुए बक्सर पहुंचे थे और गंगा स्नान कर रहे थे। बड़े भाई का नाम "अभय चंद" और छोटे भाई का नाम "निर्भय चंद" था। रानी की करुणा भरी आवाज दोनों भाइयों के कानों में पड़ी। दोनों भाइयों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर वैसे ही गीले बदन किनारे की तरफ दौड़े जहाँ पर उनके कपड़े और तलवारें रखी हुई थी।
राजपूत मे अभिमान के साथ - साथ वीरता की भावना बचपन से ही विकसित हुई और वे सदैव उत्कृष्ट कार्यों के हेतु अपने आपको अर्पण कर देते। स्त्रियों का सम्मान करने मे वे अपना गौरव समझते और उनकी तथा उनके सम्मान की रक्षा हेतु वे अपने प्राणों की बाजी भी लगा देते। यही भावना अभय चंद और निर्भय चंद मे होना स्वाभाविक ही था।
दोनो भाई असलम खां के सैनिकों से भिड़ गए। भयंकर मारकाट शुरू हो गई। असलम खां के सैनिकों को इतनी भयंकर मुठभेड़ की कल्पना ही नही थी। फिर भी वे लडे। इस भयानक युद्ध मे छोटे भाई निर्भय सिंह मारे गए। मगर अभय चंद के पराक्रम के आगे असलम खां के सैनिकों की एक न चली और वे मैदान छोड़कर भाग लिए। अभय चंद भी गंभीर रूप से घायल हुए। अर्गल की रानी के सेवक भी अब फिर से एकत्रित होकर डोले के पास आ गए।
खतरा अभी टला नही था। दो डोलियां अभय चंद की निगरानी में अर्गल के लिए लौट रहीं थी। एक मे रानी और उनकी पुत्री, दूसरे मे निर्भय चंद का मृत शरीर था।
अर्गल पहुंचने पर क्या हुआ यह अब अगली पोस्ट में।